Tuesday, July 16, 2013



"उडते हुए परिंदों की नब्ज़ टटोलता है तू,

कभी ज़मीन पर रहते इंसानों की बात भी पूछ,

परिंदों का तो जहां न कोई हुआ कभी,

आज यहां कल वहां उड़ जाएंगे,

रहेंगे जो उमर भर साथ तेरे,

कभी उन बिमारों का हाल भी पूछ तू..."

© सुनील कुमार सलैडा 20-05-2013


"कुछ गुफगू तेरे साथ हुई,
कुछ वादे तेरे साथ हुए,
बदल जाता है यह वक्त बदले यार की तरह,
फिर खुद से ही किए वादे हमने,
खुद से ही गूफतगू कर ली हमने,
यही हशर होता है मोहब्बत की मंजिल में,
कभी फूलों सी लगती है कांटों की डगर भी,
कभी सुख जाते हैं फूल दिल की विरानियों में..."

© सुनील कुमार सलैडा 18-05-2013


"तेरे रूप का सितम हम पर यूं हुआ,
के उसकी चमक में खो गये हम,
दिल को तेरे हम परख न सके,
रूप के तेरे दिवाने हुए हम,
आज टूटे हैं तेरे हाथों से हम,
तो इतना समझ लेना एे हमदम मेरे,
यह जलवा रूप के खो जाएंगे इक दिन,
अमर रहेगी तो दिल की दासतान इस दुनिया में बाकी..."

© सुनील कुमार सलैडा 13-05-2013


"तेरे साथ में क्या क्या अफसाने हुए,
वो यादों के पल आज बेगाने हुए,
आज आहटों से नहीं धड़कता है दिल मेरा,
कभी खामोशी के शोर भी पहचानता था यह..."

© सुनील कुमार सलैडा 10-05-2013


"तुम अपनी यादों में थोड़ी जगह देना मुझको,
बिखरे मेरे सपनों को सजा देना तू,
यह माना के मुककिन नहीं तेरा मुड़कर चले आना,
पर कभी घर से निकलते रास्ते में घर को मेरे इक नज़र दे जाना तू..."

©  सुनील कुमार सलैडा 09-05-2013